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Pujya Maharaj Ji

Shree Omendra Ji Maharaj

जो कुछ करते हैं बाबा श्याम करते हैं, मैं सिर्फ एक माध्यम हूं।

भारत वर्ष के लाखों गांव में से एक साधारण सा गांव था मनौना, जो आज विशेष पहचान के साथ मनौना धाम में परिवर्तित हो चुका है, इसी गांव में जन्म हुआ था पूज्य महन्त श्री ओमेंद्र महाराज का, उनके विषय मे कुछ भी उल्लेखित करने से पहले हम उनके पूर्वजों से शुरुआत करते हैं, बात उस समय की है जब देश गुलामी की जंजीरों को तोड़कर नए स्वतंत्र भारत की यात्रा शुरू करने वाला था, उस समय मनौना मे एक ज़मीदार रहते थे,श्री सुखा सिंह चौहान, आर्थिक रूप से ज़मीदार लेकिन आम जनता के दिलों में एक पितामह जैसी जगह थी, जो उनके समय मे बच्चे थे, वो आज 70 से 80 बर्ष के हो चुके हैं उनसे जब हमारी बात हुई तो ऐसा लगा जैसे कल गुजरी हुई कोई कहानी हो, शब्दों में वो ऊर्जा कि सूरज भी शर्मा जाए, उन बुजुर्गों ने बताया, कि जब कोई श्री सुखा सिंह चौहान जी को खेतों में अनाज चोरी करते हुए दिख जाता था, तो वो खुद अनजान बनकर आगे बढ़ जाते थे, ताकि चोरी करने वाले को शर्म महसूस न हो, वो कहते थे कि किसी के बच्चे भूंख से व्याकुल न हों। उन्ही के परिवार में तीन पुत्रों का जन्म हुआ, श्री सिपट्टर सिंह, श्री सोहन सिंह , श्री एवरन सिंह, ।

Pujya Mahant Shri Omendra Maharaj Ji

बड़े पुत्र मेधावी थे सो उन्होंने पढ़ाई पूरी करके अध्यापक बनना उचित समझा, शिक्षा विभाग में प्रधानाध्यापक के पद से सेवानिवृत्त हुए, उनके वारे में मशहूर था कि वो अनुशासन प्रिय बहुत थे, आज भी उनके पढ़ाये हुए मनौना गांव के आस पास गाओं में पाए जाते हैं जो बहुत अच्छे पदों पर आसीन भी रहे हैं, जब वो सेवानिवृत्त हुए तो उन्हें बतौर सेवानिवृत्ति कुछ फण्ड मिला, आमतौर पर हर कोई फण्ड का इस्तेमाल भौतिक सम्पत्ति निर्माण के कार्यों में करता है, लेकिन उन्होंने उसका इस्तेमाल देश के चारों कोनों में स्थित चार धाम यात्रा के रूप में किया, और आत्मिक शांति को प्रमुख स्थान दिया, उनसे छोटे भाई, श्री सोहन सिंह चौहान 20 वर्ष तक मनौना गांव के निर्विरोध जीवन की अंतिम अवस्था तक प्रधान रहे, कम पड़े लिखे होने के बाबजूद भी ईमानदारी और निर्णय क्षमता से अत्यधिक प्रभावित किया, सबसे छोटे भाई श्री एवरन सिंह जी ने खेती की व्यवस्था को बहुत अच्छे से निभाया, दोनों बड़े भाइयों के हर आदेश को बहुत अच्छे से पालन किया।। श्री सिपट्टर सिंह चौहान के तीन पुत्रों में सबसे छोटे थे श्री जितेन्द्र सिंह चौहान उर्फ अजय चौहान लेकिन आम जनमानस में नेताजी उपनाम से बहुत प्रसिद्ध। विभिन्न सहकारी समतियों के सभापति रहे, जिनकी कमी आज भी किसान महसूस करते हैं, अपनी फसल के लिये खरीदे गए खाद, बीज को दूसरे किसानों के लिये बांट देने वाले सामाजिक व्यक्ति थे नेताजी, सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता उनका बराबर सम्मान करते थे, वो कहते थे कि आपकी सफलता ये नही कि जीवित रहने पर कितने लोग आपके साथ हैं, बल्कि सफलता तब है कि जब आपकी मृत्यु हो तो आपकी अंतिम यात्रा में कितने लोग आपके पीछे हों,मनौना गाँव के इतिहास में इतनी लंबी अंतिम यात्रा कभी नही हुई,मनौना गाँव मे सभी प्रमुख जातियां रहती हैं,सभी जातियों में समान प्रासंगिक सम्मान प्राप्त करने वाले श्री जितेंद्र सिंह चौहान और श्रीमती माया चौहान जी के परिवार में 7 अक्टूबर 1984 को जन्म हुआ ओमेंद्र सिंह चौहान का। अपने छः भाई बहनों में चौथे स्थान को सुशोभित करने वाले श्री ओमेंद्र सिंह चौहान जी बचपन से नटखट प्रवृत्ति के रहे हैं, कहते हैं कि इस धरा पर कुछ मानसों का न जन्म सामान्य होता है और न मृत्यु और न जीवन, सब कुछ प्रभावशाली होता है, उसी प्रकार श्री ओमेंद्र जी के जीवन की एक घटना थी पुनर्जन्म की घटना, संक्षेप में बताने का प्रयास किया गया है, बचपन मे आप हवाई जहाजों और हेलिकॉप्टर को देखकर रोने लग जाते थे, बच्चों का रोना एक सामान्य घटना थी लेकिन आप रोने के साथ साथ कुछ बोलते भी थे...


उनमें कुछ नामों का उच्चारण होता था, चूंकि आपके पिता जी उच्च शिक्षित थे सो उन्होंने इस बात पर अध्ययन किया, उन्हें लगा कि ये पुनर्जन्म आधारित कुछ यादें हैं जो कालांतर तक साथ हैं, उसी समय पिताजी के बरेली में रहने वाले एक मित्र के यहां जर्मनी से एक परिवार भारत यात्रा पर आया, उस परिवार की इच्छा थी गाँव मे घूमकर भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार करना, इसलिये वो परिवार पिताजी के साथ मनौना घूमने आ गया, उस परिवार ने खेत खलिहान , बाग बगीचे, गली मोहल्ले सब बहुत गहनता से घूमे और ढेर सारे फ़ोटो ग्राफ भी लिए, शाम को विदेशी परिवार घर के बाहर चबूतरे पर गाँव के संभ्रांत लोग के साथ बैठा हुआ था, तभी आसमान में हवाई जहाज की घटना की पुनरावृत्ति हुई, आपका व्यवहार रोने और कुछ नामों के साथ चिल्लाने का था, आपके परिवार के लिये तो दैनिक सामान्य घटना थी लेकिन जर्मन परिवार अध्ययन में रुचि रखता था, इसलिए उसने आपसे ढेर सारे प्रश्न पूंछ डाले और आप भी सब कुछ बताने लगे, चूंकि विषय रुचिकर था, इसलिये जर्मन परिवार आपके बताए अनुसार दिल्ली में गहनता से अध्ययन करने गया, और आपकी पुनर्जन्म घटना बिल्कुल सत्य निकली। आप पुनर्जन्म में दिल्ली के एक बड़े व्यवसायी थे दो बच्चों का परिवार था, जो एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए थे, बर्तमान जीवन यात्रा पर वापिस आते हैं, आपकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल में हुई, माध्यमिक शिक्षा भी गाँव मे हुई, विद्यालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में आपको सरदार भगत सिंह , चंद्रशेखर, भगवान राम के भाई लक्ष्मण का किरदार निभाना आपका प्रिय शगल था, विद्यालय में एक बार स्वतंत्रता दिवस पर परुशराम लक्ष्मण संबाद का आयोजन हुआ, जिसमे आपने लक्ष्मण का अभिनय किया, जब आपने संबाद शुरू किया तो आपके रौद्र और आक्रामक रूप को देखकर बाकी किरदार निभा रहे आपके साथी मंच से नीचे उतर गए, दो बर्ष आपने देश के प्रसिद्ध गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार में भी अध्ययन किया और अपने चरित्र के अनुरूप ख्याति प्राप्त की, इंटरमीडिएट आपने आंवला के प्रसिद्ध चाचा नेहरू इंटर कॉलेज से किया, और हमेशा शिक्षकों के प्रिय रहे, बीएससी इन बायो आपने बरेली के महाराजा अग्रसेन महाविद्यालय से पूर्ण की, परिवार की इच्छानुसार आपने दिल्ली एनसीआर में आपने कुछ दिन सह व्यवसाय नौकरी भी की। लेकिन ये पक्ष आपके चरित्र के साथ समझौता था न्याय नही, अतः जल्द ही आप नौकरी छोड़कर सामाजिक यात्रा पर निकल पड़े , दिल्ली से लेकर गाँव की सभी सामाजिक गतिविधियों एवं कार्यक्रमो का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने लगे, एक प्रमुख संगठन का आपने निर्माण किया और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए दिल्ली के जंतर मंतर पर एक महीने का सफल आमरण अनशन किया, लेकिन 2015 फरवरी का वो मनहूस समय भी आया, जब आपके पिताजी अचानक हार्टअटैक से आपको छोड़ कर चले गए, चूंकि आप पिताजी के सबसे करीब थे, और पिताजी आपके चारित्रिक आदर्श भी थे, ये घटना बहुत कुछ बदल चुकी थी, आपका मन बैराग्य की तरफ मुड़ने लगा, आप भले ही बचपन से धार्मिक थे लेकिन अब आपका मन पूजा पाठ साधना में बहुत ज्यादा लगने लगा था, देर रात्रि तक पूजा करना फिर सुबह जल्दी उठकर पूजा करना आपकी दैनिक क्रिया बन चुका था, मित्रों के सुझाव से उनके साथ आप प्रत्येक महीने राजस्थान में खाटू नामक जगह पर स्थित श्री श्याम बाबा के मन्दिर में दर्शन के लिये जाने लगे, साल 2020 में विश्वव्यापी महामारी कोरोना की शुरुआत हो चुकी थी, अब यात्राओं पर सरकार का प्रतिबंध लग चुका था, आप भी अब घर पर ही पूजा पाठ करने लगे लेकिन आपको शांत वातावरण बहुत आकर्षित करता है इसलिये आप अपने खेतों पर रहने लगे, कहाँ दिल्ली एनसीआर की चकाचौंध और कहां गाँव के जंगल का अंधेरा, लेकिन उस अंधेरे में भी एक चमक थी बाबा की साधना, कोरोना अपने चरम पर था, जन्म से ज्यादा मृत्यु दर तेज थी, शमशान भूमि पर सबसे ज्यादा करुण क्रंदन था, अपने भी पराये होने लगे थे, सरकार वैक्सीन निर्माण की घोषणा कर चुकी थी, लेकिन परीक्षण के लिये स्वस्थ जीवित व्यक्ति की आवश्यकता थी, आपने सामाजिक जिम्मेदारी की उच्च स्तरीय पहल की, आपने स्वयं जाकर उपजिलाधिकारी आंवला को वैक्सीन परीक्षण के लिये शरीर दान करने की लिखित संस्तुति प्रदान कर दी।। मीडिया ने इस घटना बहुत अच्छा स्थान दिया, आप निरंतर बाबा की साधना में लीन थे, 7 अक्टूबर 2020 को आपने बाबा श्याम के मन्दिर निर्माण के लिये 4 बीघा भूमि दान कर दी, चूंकि 2021 में कोरोना और भी विनाशकारी साबित हुआ, मन्दिर निर्माण शिथिल ही रहा, 2022 का प्रारंभ हो चुका था, ये वर्ष आपके जीवन मे इतिहासकारी होने वाला था क्योंकि सब कुछ बाबा की इच्छा से चलने लगा था, होली पर्व से पूर्व का समय था, दिल्ली से एक परिवार मन्दिर दर्शन एवं गाँव मे होली पर्व मनाने आया था, उनके साथ उनकी 5 वर्ष की बच्ची थी, सुबह आरती का समय था, उस समय ज्यादा लोग नही थे, केवल 10 से 20 लोग जंगल मे आरती के लिये आते थे, सभी आरती में सम्मिलित थे केवल बच्ची खेलते खेलते अस्थायी मन्दिर के पीछे पानी के टैंक में गिर गयी, और तमाम प्रयासों के बाबजूद टैंक से नही निकल सकी, और मृत होकर तैरने लगी, जब आरती का समापन हुआ तो बच्ची की माँ उसे खोजने लगीं, जब बच्ची की टैंक में स्थिति देखी तो मां चीखने लगी, बच्ची को निकाल कर मन्दिर के सामने लाया गया तो सभी ने हर तरह से बच्ची को देखा लेकिन बच्ची की सांस थम चुकी थीं, जब आपसे निवेदन किया गया तो आपने एक सामान्य भक्त की तरह बाबा श्याम से प्रार्थना की, लेकिन अब आप सामान्य भक्त कहाँ थे, आप तो बाबा के प्रिय भक्त बन चुके थे, आपकी प्रार्थना स्वीकार हो चुकी थी, बाबा के शांत आदेश को आप समझ चुके थे और जैसे ही आपने बाबा श्याम के पवित्र जल के छींटे मारे , बच्ची में कम्पन हुआ, और वो रोने लगी, आप से ज्यादा बाबा प्रसन्न थे, क्योंकि उनके भक्त की लाज रह गयी, ईश्वरीय शक्ति तय कर चुकी थी, ओमेंद्र सिंह चौहान अब महन्त ओमेंद्र महाराज जी की कल्याणकारी यात्रा पर निकल चुके थे, अब सब कुछ वही हो रहा था जो बाबा श्याम चाह रहे थे,

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खुशियों के पल

श्री श्याम जी मन्दिर मनौना धाम

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